Utkarsh Chandel
क्या है मन मैं तेरे?
हाट में है बाजार लगे
गलियों में सजे नज़ारे
फ़िर भी यहाँ बैठ के तू ग़ज़ल लिखता है
क्या है मन मैं तेरे?

हर बच्चे खेलते, कूदते घुमते
तू खुद में खोया रहता है ओ भाई मेरे
अब बता भी दे 
क्या है मन मैं तेरे?

रात भर तू बैठा रहता
हाथ में कलम तेरे
बिनबोली बातें लिखता जाता है
क्या है मन मैं तेरे?

एक दिन तेरे कमरे में जाऊँगी
दो डायरी पढ़के आउंगी, अंदेखा
तब पता लगेगा
क्या है मन मैं तेरे?"